Connect with us

IND Editorial

केवल छोटे किसानों को ही मिले एमएसपी पर गारंटी का लाभ

Published

on

Share Post:

खेती की आड़ में धन्ना सेठ बने नेता,अफसर और पूंजीपति किसान श्रेणी से बाहर हाें।

योगीराज योगेश

संसद में तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने के बाद किसान आंदोलन की हवा निकल गई है। लेकिन फिर भी कुछ तथाकथित किसान नेता निहित स्वार्थों के चलते जबरन आंदोलन को हवा देने में लगे हैं। ये नेता नहीं चाहते की आंदोलन खत्म हो। खासतौर पर जब तक कि उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव न हो जाएं। इसलिए इनकी हर संभव कोशिश है कि कैसे न कैसे इस आंदोलन को जारी रखा जाए। वैसे सरकार ने कृषि कानून वापस लेने के साथ ही पराली जलाने के नाम पर सजा का प्रावधान भी खत्म कर दिया है। यही नहीं किसानों की सबसे बड़ी एमएसपी पर गारंटी देने की मांग पर भी सरकार ने सकारात्मक रुख अपनाते हुए कमेटी बनाने का निर्णय ले लिया है। इसके लिए किसान नेताओं से 5 नाम मांगे हैं।
कुल मिलाकर सरकार किसानों को लेकर पॉजिटिव है। समस्या का समाधान भी होता नजर आ रहा है लेकिन अब किसानों ने आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों को मुआवजा देने के साथ ही उत्तर प्रदेश के एक मंत्री अजय मिश्रा को बर्खास्त करने की मांग समेत अन्य मांगों को भी जोड़ दिया है। किसानों की मांगों का क्या होगा? यह आंदोलन अब और कितना आगे जाएगा? यह तो अभी भविष्य की गर्त में है। लेकिन इस पूरे आंदोलन ने एक और नई बहस को जन्म दिया है, वह यह है कि वास्तव में किसान कौन है? क्या किसानों के नाम पर धन्ना सेठ बने नेता, अफसर और उद्योगपति किसान हैं ? एेसे संपन्न किसानों को किस बात की सुविधाएं और सब्सिडी मिलना चाहिए? इन्हे एमएसपी पर गारंटी क्यों चाहिए? हजार करोड़ के आसामी किसान नेता राकेश टिकैत को ₹6000 की किसान सम्मान निधि क्यों मिलनी चाहिए? क्या ये धन्ना सेठ किसान नेता उन गरीब किसानों के सच्चे शुभचिंतक और हितेषी हैं जो आज भी ठंड, गर्मी और बरसात की चिंता छोड़ हल चला रहे हैं? साथ ही वे जाे खेत की मेड़ पर बैठकर प्याज के साथ सूखी रोटी खा कर अपना काम चला रहे हैं। इसलिए किसानों की मांग मानने से पहले अब यह तय होना चाहिए कि वास्तव में किसान कौन है? यह धन्ना सेठ नेता, अफसर और पूंजीपति कहीं से भी किसान नहीं हो सकते। इसलिए भविष्य में यदि कानून बनता है तो केवल छोटे यानी सीमांत कृषकों को ही एमएसपी पर गारंटी का लाभ मिलना चाहिए। बड़े काश्तकारों को किसान की श्रेणी से बाहर रखना चाहिए।

Advertisement

केवल सीमांत कृषकों का ही हाे कर्जा माफ, बिजली बिल हाफ :

वास्तव में सीमांत कृषक यानी छोटे किसान ही असली किसान है। इसलिए सरकार को अब केवल सीमांत कृषकों के हित और लाभ के लिए ही योजनाएं और कानून बनाने चाहिए। चाहे वह कर्जा माफ हो या बिजली बिल हाफ करने की बात हो। केवल सीमांत कृषकों को ही इसका लाभ मिलना चाहिए। इसके अलावा किसानों की इनकम लिमिट भी तय होना चाहिए। जो किसान इनकम टैक्स के दायरे में आते हाें ताे उन्हें किस बात की सब्सिडी और सुविधा मिलना चाहिए? क्योंकि हमारे देश में ताे 80% आबादी किसान हैं। बड़े-बड़े नेता, अफसर और धन्ना सेठ पूंजीपति सब के सब किसान हैं। ये सब किसानों के नाम पर सरकारी योजनाओं का लाभ ले रहे हैं। इन किसानों की ठीक से तफ्तीश हो जाए तो यह साफ हो जाएगा कि इनमें से अधिकांश केंद्र सरकार की किसान सम्मान निधि के रूप में मिलने वाली ₹6000 की राशि तक लेने से नहीं चूक रहे। क्या वास्तव में इन तथाकथित किसानों को यह राशि मिलनी चाहिए? क्या यह किसान वास्तव में उन छोटे जरूरतमंद किसानों का हक नहीं मार रहे जिन्हें इस रकम की महती आवश्यकता है? इसलिए पहली फुर्सत में संपन्न किसानों काे सरकारी सुविधा बंद होनी चाहिए। वरना सरकार नीतियां और योजनाएं बनाती रहेगी और किसानों के नाम पर धन्ना सेठ इन योजनाओं का लाभ लेते रहेंगे।

700 किसानों की मौत का आंकड़ा कहां से आया:

Advertisement

बताया जा रहा है कि किसान आंदोलन के दौरान 700 किसानों की मौत हुई। कई किसान नेता इस संख्या को 800 बता रहे हैं और कई तो इस आंकड़े को 1000 तक पहुंचा रहे हैं। कुल मिलाकर किसी के पास कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं है। हो सकता है इनमें से आधे से ज्यादा कोरोना की चपेट में आने से मरे हों। बहरहाल अभी यह स्थिति स्पष्ट नहीं है कि कितने किसानों की मौत हुई है। तो फिर 700 किसानों को शहीद का दर्जा देने की मांग कहां से उठ रही है। यह भी विचित्र बात है कि यह एक ऐसा अनोखा आंदोलन था जिसमें पुलिस ने न किसी पर लाठियां भांजी न गोलियां चलाईं तो 700 किसान कैसे मर गए? हालांकि यह बात सही है कि किसानों की मौत तो हुई है लेकिन स्पष्ट आंकड़ा सामने आना चाहिए। यह भी सवाल है कि आखिर 700 किसान मरे तो उनका अंतिम संस्कार कहां किया गया। उनके परिजनों को सूचना दी गई या नहीं। इसलिए यह सब अभी जांच का विषय है। किसान नेताओं को भी मौत का स्पष्ट आंकड़ा बताना चाहिए ताकि सरकार के सामने मांग रखने में आसानी हो। अभी तो मनमर्जी का आंकड़ा चल रहा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Advertisement
Share Post:
Continue Reading
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Address : IND24, Plot No. 35, Indira Press Complex,
MP Nagar, Zone – 1, Bhopal (MP) 462011

Copyright © 2021 Ind 24 News Channel.