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Navin Vichar

संसार में सबसे बड़ी शक्ति है मित्रता, यदि आपको सच्ची मित्रता प्राप्त हो जाए वहीं सबसे बड़ा धन है।

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कुछ रिश्ते जन्म से होते हैं!
कुछ रिश्ते अस्तित्व से बनते है!
कुछ रिश्ते ऐसे होते है जिन्हें हम चुनते हैं, जिन्हें हम बनाते है, उनमें से एक रिश्ते का नाम है मित्रता । मेरी मित्रता सूची बहुत ही छोटी है। मैं पहचान को मित्रता के दायरे में नहीं रखता, और सामान्य परिचय बालों से अपना कोई राग द्वेष नहीं, ईश्वर उन्हें प्रसन्न रखे। बाकी जिनको मैंने मित्रता के निम्नवर्णित उच्च मानदंडों पर पाया है, वह मेरे लिए मित्र नहीं ईश्वर का प्रतिरूप हैं, शेष मित्र के वेश में कालनेमि भी मिले उनसे यथासंभव दूरी बना ली।
मित्रता की जो अद्भुत व्याख्या श्री रामचरितमानस में है, शायद ही कहीं और होगी। जीवन पथ पर मित्र के नाते आपकी क्या भूमिका रही और आपको क्या प्रतिफल मिला, आपने भी अपने जीवन के अच्छे बुरे क्षणों में इनमें से कुछ अनुभव जरूर लिए होंगे। सोचिये समझिये और अपने कार्य व्यवहार में लाइये।

चौपाई
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।
तिनहिं बिलोकत पातक भारी।।
अर्थात: जो मित्र के दुख को देखकर दुखी नहीं है, वह मित्र कहलाने योग्य नहीं, ऐसे लोगों को देखने भर से पाप लगता है।

चौपाई
निज दुख गिरि सम रज करि जाना।
मित्रक दुख रज मेरु समाना।
अर्थात: जो व्यक्ति अपने पहाड़ जैसे दुख को धूल की तरह मानता है और मित्र के धूल जैसे दुख को बहुत बड़े पहाड़ की तरह मानता है, वही आपका सच्चा मित्र है।

चौपाई
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा।
गुण प्रगटे अवगुनहिं दुरावा।।
अर्थात: एक सच्चे मित्र का धर्म होता है कि वह अपने मित्र को गलत और अनैतिक कार्य करने से रोके और उसके गुणों को निखार कर उसके दुर्गुणों को दूर करे।

चौपाई
लेत देत मन संक न धरहिं।
बल अनुमान सदा हित करहिं।।
अर्थात: जो मित्र से किसी भी प्रकार की सहायता लेने या देने में शंका न करे और अपनी क्षमता अनुसार मित्र की सहायता अवश्य करे वहीं सच्चा मित्र है।

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चौपाई
विपत काल कर सतगुन नेहा।
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।
अर्थात: विपत्ति के समय जो अपने मित्र को स्नेह करे सहायता कर, वेद और शास्त्रों के अनुसार वहीं सच्चा मित्र है।

चौपाई
आगे कह मृदु वचन बनाई।
पाछे अनहित मन कुटलाई।।
अर्थात: ऐसा मनुष्य जो आपके सामने तो बहुत अच्छी अच्छी बातें करे और पीठ पीछे आपकी निंदा करे ऐसों का साथ छोड़ना ही बेहतर है।

चौपाई
जाकर चित अहि गति सम भाई।
अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई।।
अर्थात: जिसके मन की चाल सांप के समान टेढ़ी मेढ़ी प्रतीत हो यानि कि जिसका कार्य व्यवहार मित्रता की परिभाषा के विपरीत हो, ऐसे कुमित्र को त्यागने में ही भलाई है।

चौपाई
सेवक सठ, नृप कृपन, कुनारी।
कपटी मित्र, सूल सम चारी।।
अर्थात: मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, कुलटा स्त्री से जो खतरा होता है, बैसे ही एक कपटी मित्र भी जीवन में किसी खतरे से कम नहीं होता। ये चारों ही शूल (कांटे) के समान होते है। ऐसे कपटी व्यक्तियों से सचेत रहें और उनसे दूर हो जाएं।

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