Connect with us

IND Editorial

जनजातियों को जीतने में लगे मोदी और शिवराज…

Published

on

Share Post:

ना काहू से बैर/राघवेंद्र सिंह

कल तक जिन जनजातियों के दिलों पर राज करती थी कांग्रेस, अब उन्हीं को दिलों में बसाने में लग गई है पूरी भाजपा। मध्यप्रदेश में यह बीड़ा मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने उठाया है और उस पर मुहर लगाने 15 नवंबर को भोपाल आ रहे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम यहां की अंतिम हिन्दू शासक रानी कमलापत (कमलापति) रखने भाजपा के इसी अभियान से जोड़ कर देखा जा रहा है। यह तो अभी आरम्भ है। बहुत से  भौगोलिक और नीतिगत बदलाव भी केंद्र और भाजपा शासित राज्यों में देखने को मिल सकते हैं। संदर्भ मध्यप्रदेश का है लेकिन इसके राष्ट्रीय महत्व का अंदाजा पीएम मोदी की मौजूदगी से लगाया जा सकता है। जनजातीय समीकरण सत्ता पाने और खोने का बड़ा जरिया है। इसे पिछले पन्द्रह वर्षों से भाजपा जितनी शिद्दत से जाना समझा है उसे शायद कांग्रेस भी नही समझ पाई वरना वह जोबट के रावत परिवार को भाजपा में जाने नही देती। मप्र की 47 जनजातीय बहुल विधानसभा सीटें जिस पार्टी की झोली में चली जाती सत्ता के सिंहासन पर वही विराजती है। पिछले दिनों गृहमंत्री अमित शाह भी जबलपुर आए थे और वहां उन्हाेंने जनजातीय के गाेंडवाना के प्रतापी राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह से जुड़े कार्यक्रम में आए थे। यह भी जनजातियों के दिल जीतने के हिस्सा था।

जबलपुर- मण्डला, बालाघाट, झाबुआ- रतलाम से लेकर निमाड़ तक की करीब 84 विधानसभा सीटों पर जनजातीय मत जिस तरफ झुक जाएं सरकार उसी दल की बन जाती है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने इस वोट बैंक के दिल में जगह बनाई और परिणाम स्वरूप कांग्रेस कमलनाथ के रूप में सत्तानशी हो गई थी। इस दरम्यान जनजातियों के संगठन जयेश ने चुनाव में उतरने का निर्णय किया और फिर कांग्रेस को समर्थन देने का असर तीन चुनाव जीतने वाली भाजपा विपक्ष में दिखाई दी। इसके साथ ही जनजातीय आदिवासियों को हिंदुओं से अलग करने के प्रयास भी तेज होने लगे। इससे भाजपा को अपने साथ देश के कमजोर होने का भी खतरा दिखने लगा। लगता है ऐसी ही कुछ वजहों ने भाजपा को इस ओर ध्यान देने के लिए विवश कर दिया। संघ परिवार इस लाइन पर पहले से ही आदिवासी- वनवासियों के बीच काम कर रहा है। लेकिन सत्ता में रहते जब भाजपा से इस वर्ग की अनदेखी हुई और बदले में सरकार गंवानी पड़ी तो उसके कान खड़े हुए और जोबट विधानसभा चुनाव को प्रयोग के तौर पर लड़ा गया। जिसके तहत कांग्रेस के रावत परिवार को भाजपा में लाकर पूर्व मंत्री सुलोचना रावत को उपचुनाव में पार्टी के वफादारों की कीमत पर मैदान में उतरा गया और जीत हासिल की। प्रदेश भाजपा में इस कदम को अच्छा नही माना गया लेकिन दिल्ली दरबार का जरूर इसे मूक समर्थन था। अब इस तरह की योजना जनजातीय बहुल राज्यों में प्रयोग किया जा सकता है। इसमें छत्तीसगढ़ से लेकर झारखण्ड और उड़ीसा भी शामिल हो सकते हैं।

Advertisement

बॉक्स

 

जनजातियों को हिंदुओं से अलग नही होने देंगे संघ- भाजपा

भाजपा और संघ परिवार को लगता है कि आदिवासी- जनजातियों को हिंदुओं से अलग करने का देशव्यापी षडयंत्र किया जा रहा है। इसके पीछे लंबे समय से एक सोची समझी रणनीति के तहत काम किया जा रहा है। इसमें धर्मांतरण भी एक गम्भीर मामला है। इसे रोकने की कोशिशों में संघ परिवार आपरेशन घर वापसी के कार्यक्रम भी करता रहता था। ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, झारखंड से लेकर पूर्वोत्तर तक जनजातियों को  धर्मांतरण के जरिए सनातन धर्म से अलग करने का काम कुछ सामाजिक और राजनैतिक दल कर रहे हैं। संघ परिवार वनवासियों के बीच कई प्रकल्पों के जरिये इसे रोकने का काम कर रहा है। लेकिन अब भाजपा ने लगता है इसको अपने एजेंडे में सबसे ऊपर रखा है।  भोपाल में रेलवे स्टेशन गोंडवाना की रानी कमलापति के नाम से रखने के बाद अब ये तय हो गया है की जनजाति महापुरुष भगवान बिरसा मुंडा से लेकर मालवा निमाड़ के स्वतंत्रता सैनानी टांटिया भील, भीमा नायक, सीताराम कवर, रघुनाथ सिंह भिलाला, जबलपुर के राजा शंकर शाह, रघुनाथ शाह को अब जान जान से परिचित कराया जाएगा। इससे जनजाति और हिन्दू समाज के बीच एकता बढ़ेगी। भाजपा को यह आशंका है की सिख और जैन पंथ की तरह जनजातियों को भी हिन्दू समाज से भी अलग करने का ताना बाना कई दशकों से बुना जा रहा है। आने वाले दिनों में भाजपा के लिए इसमें सफलता मिलती है तो यह राष्ट्रीय एकता के साथ हिंदुत्व को मजबूत करने वाला होगा।

Advertisement

बॉक्स
जनजाति में घुल मिल रहे शिवराज और साधना
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पत्नी साधना सिंह के साथ जनजाति समुदायों के बीच घुलमिलकर घनिष्ठ रिश्ता बना रहे हैं। पिछले उपचुनाव में यह बात लोगो ने बड़ी शिद्दत से महसूस भी की है। आने वाले चुनावों में इसके असर दिखना भी शुरू हो सकते हैं। आदिवासी जनजाति से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के भी आत्मीय रिश्ते रहे हैं। बहुत हद तक राजीव गांधी ने भी इसको निभाने की कोशिश की थी। इसका लाभ कांग्रेस पार्टी को चुनाव में जनजाति के वोटों के रूप में भी मिलता था। कुलमिलाकर यह अभियान सामाजिक समरसता के साथ राजनैतिक शक्ति हासिल करने का भी बड़ा जरिया बनेगा।

 

 

Advertisement
Share Post:
Continue Reading
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Address : IND24, Plot No. 35, Indira Press Complex,
MP Nagar, Zone – 1, Bhopal (MP) 462011

Copyright © 2021 Ind 24 News Channel.