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Loksabha Election: पहली बार कांग्रेस में एक भी मुस्लिम-ब्राह्मण को टिकट नहीं, आखिर क्यो मुस्लिम समुदाय को किनारे करने लगी हैं राजनीतिक पार्टियां

By: payal trivedi | Created At: 27 March 2024 09:50 AM


लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ ही राजस्थान में कांग्रेस ने 25 में से 24 सीटों पर के टिकट की घोषणा कर दी। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है, जब पार्टी ने किसी भी मुस्लिम या ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है, जबकि दोनों बड़े वोट बैंक हैं।

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Jaipur: लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ ही राजस्थान में कांग्रेस ने 25 में से 24 सीटों पर के टिकट की घोषणा कर दी। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है, जब पार्टी ने किसी भी मुस्लिम या ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है, जबकि दोनों बड़े वोट बैंक हैं। अब केवल एक सीट बांसवाड़ा-डूंगरपुर पर टिकट की घोषणा शेष है। लेकिन यह सीट एसटी आरक्षित है तो यहां कोई गुंजाइश नहीं है कि पार्टी किसी मुस्लिम या ब्राह्मण नेता को टिकट दे। दोनों जातियों का प्रदेश की लगभग सभी सीटों पर प्रभाव है। 10-12 सीटों पर तो इनकी संख्या पहले या दूसरे नंबर पर मानी जाता है। लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के मुस्लिम और ब्राह्मण उम्मीदवार ना उतारने के पीछे पार्टी के कुछ तर्क है चलिए आपको बताते हैं आखिर क्या है कांग्रेस की रणनीति....

बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में कभी नहीं उतारी मुस्लिम उम्मीदवार

भाजपा ने राजस्थान में लोकसभा चुनावों में कभी किसी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया है, लेकिन ब्राह्मणों को हमेशा टिकट देती आई है। इस बार भी जयपुर से मंजू शर्मा और चित्तौड़गढ़ से प्रदेशाध्यक्ष सीपी जोशी को टिकट दिया है। भाजपा भी 24 सीटों पर घोषणा कर चुकी। एक सीट भीलवाड़ा पर घोषणा होना शेष है। भीलवाड़ा आरक्षित सीट नहीं है। कांग्रेस ने जयपुर से डॉ. सुनील शर्मा को टिकट दिया था। ब्राह्मण समाज का यह एकमात्र टिकट था। सुनील शर्मा के आरएसएस समर्थक संस्था 'जयपुर डायलॉग्स' से कनेक्शन होने को लेकर भारी विवाद हो गया था।

सुनील शर्मा ने की थी उम्मीदवारी छोड़ने की पेशकश

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने ट्वीट करके इस संस्था से जुड़ाव रखने वाले को टिकट देने पर सवाल उठाए थे। थरूर के सवाल उठाने के बाद कांग्रेस से जुड़े कई नेताओं ने सुनील शर्मा का टिकट बदलने की मांग उठाई थी। शाम होते-होते सुनील शर्मा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके उम्मीदवारी छोड़ने की पेशकश की थी। शर्मा की प्रेस कॉन्फ्रेंस के कुछ ही देर बाद उनका टिकट बदल गया और प्रताप सिंह खाचरियावास को उम्मीदवार बना दिया गया।

कांग्रेस ने दिया ये तर्क

कांग्रेस के प्रदेश इलेक्शन वार रूम के चेयरमैन जसवंत सिंह गुर्जर कहते हैं- पार्टी ने जो भी टिकट दिए हैं, वो संबंधित सीट के सर्वे, फीडबैक व कार्यकर्ताओं की मांग के अनुसार दिए हैं। मुस्लिम और ब्राह्मण कांग्रेस के खास मतदाता रहे हैं और आगे भी रहेंगे। टिकट चयन के बहुत से आधार होते हैं। उसके आधार पर टिकट तय होते हैं। केवल जाति, समुदाय या वर्ग के आधार पर टिकट नहीं दिए जा सकते। कांग्रेस ने पहले कई बार इन दोनों जाति के नेताओं को टिकट दिए हैं। उन्हें मंत्री, मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री और प्रदेशाध्यक्ष जैसे पद दिए हैं। इस बार भी लोकसभा चुनावों में पार्टी ने राजस्थान के बाहर दूसरे राज्यों में कई मुस्लिम और ब्राह्मण नेताओं को टिकट दिए हैं, लेकिन राजस्थान में इस बार संभव नहीं हो सका है।

2009 में ये थी कांग्रेस की रणनीति

वर्ष 2009 से पहले जो परिसीमन था उसमें कांग्रेस हमेशा किसी न किसी मुस्लिम और ब्राह्मण को टिकट देती थी। वर्ष 2009 में हुए नए परिसीमन के बाद बीकानेर, श्रीगंगानगर, भरतपुर, करौली-धौलपुर एससी और दौसा, बांसवाड़ा-डूंगरपुर और उदयपुर सीटें एसटी के लिए आरक्षित हो गईं। शेष बची 18 सीटों पर कांग्रेस ने 2009, 2014 व 2019 में 1-1 टिकट मुस्लिम उम्मीदवार व 2 से 3 टिकट ब्राह्मण प्रत्याशी को दिए। इसी तरह पार्टी औसतन 5 टिकट जाट, 2-3 टिकट राजपूत, 2-2 टिकट मीणा-आदिवासी और 1-1 टिकट वैश्य-गुर्जर को देती रही है। 2009 में कांग्रेस को इस नीति का फायदा भी मिला था और पार्टी 25 में से 20 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। पिछले कई चुनावों में कांग्रेस के इस जातिगत कॉम्बिनेशन को श्रेष्ठ माना जाता रहा है, जिसमें लगभग सभी जाति-समुदायों को प्रतिनिधित्व दिया जाता रहा है। इस बार इसमें बदलाव हो गया है। वर्ष 2009 में कांग्रेस ने चूरू से मकबूल मंडेलिया, 2014 में टोंक-सवाईमाधोपुर से मोहम्मद अजहरूद्दीन (क्रिकेटर) और 2019 में चूरू से रफीक मंडेलिया को टिकट दिया था। हालांकि यह तीनों नेता चुनाव हार गए थे। राजस्थान में एक बार सीएम के पद पर बरकतुल्लाह खान और एक बार सांसद (झुंझुनूं) कैप्टन अय्यूब खान जैसे मुस्लिम नेता रहे हैं।

बीते सालों में लोकसभा में ये थे ब्राह्मण प्रत्याशी

- वर्ष 2009 : कांग्रेस ने चित्तौड़गढ़ से गिरिजा व्यास, भीलवाड़ा से सीपी जोशी और जयपुर से महेश जोशी को टिकट दिया था। यह तीनों सीटें कांग्रेस ने जीती थीं। तब तत्कालीन कांग्रेस गठबंधन की यूपीए सरकार में व्यास और जोशी तो केन्द्रीय मंत्री भी बने थे। वे दोनों कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष भी रहे हैं।

- वर्ष 2014 : सीपी जोशी को जयपुर ग्रामीण से, महेश जोशी व गिरिजा व्यास को जयपुर व चित्तौड़गढ़ से टिकट दिए गए थे। तीनों चुनाव हार गए थे।

- वर्ष 2019 : कांग्रेस ने भीलवाड़ा से रामपाल शर्मा को टिकट दिया था। इससे एक वर्ष पहले अजमेर में सांसद का उप चुनाव (जनवरी-2018) हुआ था। उसमें कांग्रेस ने रघु शर्मा को टिकट दिया था और वे चुनाव जीते थे।

ब्राह्मण वर्ग को कांग्रेस का खास मतदाता माने जाने के पीछे का कारण

राजस्थान में ब्राह्मण वर्ग को कांग्रेस का खास मतदाता माने जाने के पीछे कारण रहा है। राजस्थान के पहले मुख्यमंत्री पं. हीरालाल शास्त्री से लेकर जयनारायण व्यास, टीकाराम पालीवाल और हरिदेव जोशी तक ब्राह्मण थे। उनके अलावा केन्द्र में मंत्री और सांसद के पदों पर पं. नवलकिशोर शर्मा, भुवनेश चतुर्वेदी, डॉ. सीपी जोशी, डॉ. गिरिजा व्यास, डॉ. महेश जोशी, डॉ. रघु शर्मा, रामपाल उपाध्याय, गिरधारी लाल व्यास आदि रहे हैं।

कितनी और किन सीटों पर प्रभावी जनसंख्या है मुस्लिमों और ब्राह्मणों की

चलिए आपको बताते हैं कि कितनी और किन सीटों पर मुस्लिमों और ब्राह्मणों की प्रभावी जनसंख्या है... बात ब्राह्मण की करे तो जयपुर, उदयपुर, जोधपुर, कोटा, भीलवाड़ा, अलवर, चित्तौड़गढ़, बीकानेर, भरतपुर, अजमेर, सीकर, पाली, बूंदी के शहरी क्षेत्रों में ब्राह्मण का वोटिंग के लिहाज से काफी अच्छा प्रभाव माना जाता है। इसके अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी इस समाज की स्थिति प्रभावशाली है। पिछले तीन चुनावों में लगभग 2-3 लोकसभा सीटों पर ब्राह्मण उम्मीदवार जीत रहे हैं। विधानसभा की 200 में से 15-20 सीटों (आरक्षित वर्ग की सीटों के अलावा) पर हर चुनाव में ब्राह्मण उम्मीदवार जीतते हैं। दोनों प्रमुख पार्टियां लगभग 15-20 टिकट इसी समाज के प्रत्याशियों को देती रही हैं।

अगर बात मुस्लिम की करे तो जैसलमेर-बाड़मेर, नागौर, अजमेर, जयपुर, भीलवाड़ा, कोटा, टोंक-सवाईमाधोपुर, भरतपुर, करौली-धौलपुर, अलवर, सीकर, चूरू, झुंझुनूं , बीकानेर, जोधपुर आदि सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की प्रभावी संख्या है। विधानसभा चुनावों में 200 में से 8-10 विधायक हर बार मुस्लिम जीत कर आते हैं। हालांकि लोकसभा में अब तक केवल एक बार ही मुस्लिम सांसद जीत दर्ज कर पाए हैं।

इन लोकसभा सीटों पर प्रभाव

प्रदेश की कुछ लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम और ब्राह्मण मिलकर सबसे बड़ा मतदाता समूह बनते हैं। इनमें जयपुर सबसे प्रमुख है। इसी तरह अजमेर, अलवर, भरतपुर, भीलवाड़ा, जोधपुर, सीकर, चूरू, कोटा-बूंदी, बीकानेर व झुंझुनूं भी ऐसी लोकसभा सीटें हैं।

'मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक पार्टियां किनारे करने लगी हैं'

वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ कहते हैं- लोकतंत्र में सभी वर्गों की भागीदारी हो यह एक बुनियादी और सबसे जरूरी बात है। वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां देश भर में ऐसी बन गई हैं कि मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक पार्टियां किनारे करने लगी हैं। कांग्रेस द्वारा प्रदेश की एक भी सीट पर इस वर्ग को प्रतिनिधित्व नहीं देना उचित नहीं कहा जा सकता। किसी मुस्लिम अफसर को मुख्य सचिव या किसी बोर्ड-आयोग का चेयरमैन बनाने से उन्हें तसल्ली तो दी जा सकती है, लेकिन यह वो प्रतिनिधित्व नहीं है, जो एक समुदाय का मिलना चाहिए। ब्राह्मण वर्ग राजनीतिक रूप से काफी आगे रहा है, लेकिन एक बड़े मतदाता समूह को प्रतिनिधित्व नहीं देना पार्टी के राजनीतिक हित में नहीं कहा जा सकता है।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व वोटों की लाभ-हानि तय करता ही है

हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (जयपुर) के पूर्व कुलपति सन्नी सेबेस्टियन का कहना है- आम तौर पर यह स्थापित तथ्य है कि जिस भी जाति-समुदाय को आप जितना राजनीतिक प्रतिनिधित्व टिकटों के रूप में देते हैं, उसका मतदान उसी अनुपात में आपके पक्ष या विपक्ष में रहता है। मुस्लिम और ब्राह्मण दो बड़े समुदाय हैं और कांग्रेस राजस्थान में एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी है। उसके द्वारा एक भी टिकट नहीं देना बहुत से लोगों में मतदान के प्रति अरुचि पैदा कर सकता है। परिणाम आने पर पार्टी को इससे होने वाले लाभ और हानि स्पष्ट हो ही जाएंगे।