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बदलाव के कानून: नागरिक अधिकार- स्वतंत्रता न हो प्रभावित

By: Sanjay Purohit | Created At: 02 July 2024 10:17 AM


सोमवार से देश में भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम- भारतीय दंड सहिता 1860, दंड प्रक्रिया संहिता 1973 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 का स्थान ले चुके हैं।

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निश्चित रूप से किसी भी कानून का मकसद नागरिकों के जीवन,स्वतंत्रता, संपत्ति व अधिकारों की रक्षा करना ही होता है। जिससे किसी सभ्य समाज में न्याय की अवधारणा पुष्ट हो सके। कानून समाज के व्यापक अनुभवों व जरूरतों के अनुरूप स्वरूप ग्रहण करते हैं। ऐसे में एक जुलाई से पूरे देश में लागू हुई भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता तथा भारतीय साक्ष्य संहिता को लेकर उम्मीद करनी चाहिए कि यह बदलाव न्याय की कसौटी पर खरा उतरे। उल्लेखनीय है कि बदलाव से जुड़े विधेयक बीते साल संसद में पारित किये गए थे। सार्वजनिक विर्मश में अकसर यह बात सामने आती रही है कि औपनिवेशक सत्ता को मजबूत करने के लिये जो कानून अंग्रेजों ने बनाये थे, क्या उन्हें स्वतंत्र भारत में सात दशक बाद भी लागू रहना चाहिए? इस बाबत समय-समय पर शीर्ष अदालत की टिप्पणियां व मार्गदर्शन भी सामने आए हैं। कहा जाता रहा है कि सांस्कृतिक, धार्मिक व भौगोलिक विविधता वाले देश के लिये बनाये गये कानूनों को व्यापक सार्वजनिक विमर्श के बाद ही लागू किया जाना चाहिए था। ऐसे सवाल इन कानूनों को बनाते समय संसद में बहस की अवधि और विपक्ष के एक बड़े हिस्से के सदन से बाहर रहने को लेकर उठाये जाते रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञ कहते रहे हैं कि देश की न्याय व्यवस्था को बदलने वाले कानूनों पर पर्याप्त बहस जरूरी होती है। यही वजह है कि कुछ गैर-बीजेपी शासित राज्यों की तरफ से विरोध के स्वर भी सुनायी दिए। इस बाबत कहा जा रहा है कि केंद्र के अधिकारियों का कहना है कि राज्य सरकारें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में अपनी ओर से संशोधन के लिये स्वतंत्र हैं। मगर एक हकीकत है कि सोमवार से देश में भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम- भारतीय दंड सहिता 1860, दंड प्रक्रिया संहिता 1973 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 का स्थान ले चुके हैं।

वहीं केंद्र सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि जहां ब्रिटिश काल में बने कानूनों का मकसद दंड देना था, वहीं नये कानूनों का मकसद नागरिकों को न्याय देना है। मौजूदा चुनौतियों व जरूरतों के हिसाब से कानूनों को बनाया गया है। उल्लेखनीय है कि भारतीय न्याय संहिता में विवाह का प्रलोभन देकर छल के मामले में दस साल की सजा, किसी भी आधार पर मॉब लिंचिंग के मामले में आजीवन कारावास की सजा, लूटपाट व गिरोहबंदी के मामले में तीन साल की सजा का प्रावधान है। आतंकवाद पर नियंत्रण के लिये भी कानून है। किसी अपराध के मामले में तीन दिन में प्राथमिकी दर्ज की जाएगी तथा सुनवाई के बाद 45 दिन में फैसला देने की समय सीमा निर्धारित की गई है। वहीं प्राथमिकी अपराध व अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क सिस्टम के जरिये दर्ज की जाएगी। व्यवस्था की गई है कि लोग थाने जाए बिना भी ऑनलाइन प्राथमिकी दर्ज कर सकें। साथ ही जीरो प्राथमिकी किसी भी थाने में दर्ज की जा सकेगी। लेकिन कानून के जानकार पुलिस रिमांड की अवधि बढ़ाने पर चिंता जता रहे हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के अनुरूप राजद्रोह कानून को तो हटा दिया गया है लेकिन राष्ट्रीय एकता, अखंडता व संप्रभुता के अतिक्रमण को नये अपराध की श्रेणी में रखा गया है। संगठित अपराधों के लिये तीन साल की सजा का प्रावधान है। इसके साथ ही अपराध की जांच-पड़ताल को आधुनिक तकनीक के जरिये न्यायसंगत बनाने का प्रयास किया गया है। जिसमें फॉरेंसिक साक्ष्य जुटाना भी अनिवार्य है ताकि अपराधी संदेह का लाभ न उठा सकें। दूसरी ओर सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल अपराध नियंत्रण में बढ़ेगा। नये कानून के अनुसार मौत की सजा पाये अपराधी को खुद ही दया याचिका दायर करनी होगी, कोई संगठन या व्यक्ति ऐसा न कर सकेगा। दूसरी ओर कुछ कानून के जानकार नए आपराधिक कानूनों के लागू होने से उत्पन्न कई न्यायिक परेशानियों के सामने आने की बात कह रहे हैं। वे नये प्रावधानों पर गंभीर विचार-विमर्श की जरूरत बताते हैं। तो कुछ लोग अभिव्यक्ति के अतिक्रमण की बात कर रहे हैं। सवाल उठाये जा रहे हैं कि इन कानूनों के लागू होने से पहले हुए अपराधों की न्याय प्रक्रिया में विसंगति पैदा हो सकती है।