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कन्हैया ने कांग्रेस को क्यों चुना, क्या बिहार में कांग्रेस की किस्मत बदलेगी

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कन्हैया कुमार का कांग्रेस चुनने का कारण सीपीआई की राजनीति में कमजोर होती पकड़ है। कई युवा जो अपने राजनीतिक जीवन के गुण कम्युनिष्ठ की छात्र राजनीति की पाठशाला से सीखते हैं, उनके पास राजनीति में करियर बनाने के लिए सीपीआई के बेहतर प्लेटफॉर्म नहीं है। इसीलिए कन्हैया कुमार ने नए विकल्प के तौर पर कांग्रेस को चुना। बात करें अगर सीपीआई से कन्हैया के रिश्तों की तो वो भी कोई खासे अच्छे नहीं थे। बिहार चुनाव में सीपीआई का अच्छा गठबंधन बन चुका था। लेकिन पार्टी ने कन्हैया को आगे नहीं बढ़ाया। चुनाव के दौरान कन्हैया ने जो प्रचार अभियान शुरू किया था, वो भी पार्टी की लीडरशिप ने रुकवा दिया था।

दरअसल सीपीआई ने कन्हैया के सामने कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा था। सीपीआई ने कन्हैया के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया था। दरअसल पार्टी के पटना ऑफिस में बेगुसराय जिला काउंसिल की बैठक होनी थी। जिसमें शामिल होने के लिए कन्हैया अपने समर्थकों के साथ पहुंचे थे। किसी वजह से बैठक स्थगित कर हो गई। इसकी सूचना उनको ना देने पर उनकी बहस कार्यालय सचिव इंदुभूषण वर्मा के साथ हो गई। इसके बाद उनके समर्थकों ने वर्मा के साथ मारपीट कर दी थी। इसके बाद हैदराबाद में कन्हैया कुमार के खिलाफ पार्टी ने निंदा प्रस्ताव पारित कर दिया था।

कन्हैया के कांग्रेस में शामिल होने की खबरें चल रही थी। जिस पर राज्यसभा सांसद और सीपीआई के महासचिव डी.राजा ने इन अफवाहों को शांत करने के लिए पार्टी के दफ्तर में एक प्रेस कांफ्रेस बुलाई। जिस प्रेस कांफ्रेस में कन्हैया का इंतजार सीपीआई के नेता करते रहे, लेकिन कन्हैया नहीं पहुंचे।

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कन्हैया के आने से कांग्रेस को क्या बिहार मिलेगा फायदा

बिहार में सभी राजनीतिक दल दूसरी पीढ़ी के नेताओं को आगे बड़ा रहे हैं। जदयू और राजद जैसी क्षेत्रीय पार्टियां या भाजपा-कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां सभी पार्टियों में दूसरी पीढ़ी के नेताओं को आगे किया है।

तेजस्वी ने राजद की कमान अपने हाथ में ले ली है। लोक जनशक्ति पार्टी की अगुवाई चिराग पासवान कर रहे हैं। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार पहले ही कह चुके हैं कि अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे। भाजपा ने भी सुशील कुमार मोदी को हटाकर साफ संकेत दे दिए हैं।

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ऐसे में अगर कांग्रेस की तरफ देखा जाए तो उसके पास बिहार के अंदर कोई युवा नेता नहीं है, जो लंबी दूरी का घोड़ा बन सके। उसे कन्हैया में वो बात नजर आ रही है, जो लंबे समय में राज्य स्तर पर पार्टी को मजबूती दे सकता है। बिहार में जितनी जरूरत कांग्रेस को कन्हैया की है, उतनी ही जरूरत कन्हैया को कांग्रेस की भी है।

 

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